Hindi Poetry inspired from Shiv Tandav Stotram (शिव तांडव स्तोत्रम)

एक छोटा सा प्रयास है और लोगों तक शिव तांडव स्तोत्रम पहुंचाने का। कई लोग बोलते हैं की थोड़ा कठिन होता है उनके लिए शिव स्तोत्र पढ़ना, क्यूंकि थोड़े कठिन संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया गया है रावण द्वारा। तो मैंने सोचा की क्यों न इसका हिंदी अनुवाद किया जाए एक कविता के रूप में।

अगर कुछ गलत लगे तो मुझे बताइयेगा,
और अच्छा लगे तो और लोगो को भी पढाइयेगा!

ॐ नमः शिवाय।

Watch the video here – https://www.youtube.com/watch?v=Cem77qDw9rw

जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥१॥

जल जटा में बह रहा, कंठ शुद्ध कर रहा,
सांप का जो हार है, गले में वो लटक रहा,
डमड डमड डमड, डमरू उनका कर रहा,
शिव जी नृत्य कर रहे, संपन्न सभी को करें।

जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥

आपका प्रभाव है, गंगा सर पे बह रही,
लहरें ऊँची चल रही, जटा में वो उमड़ रही।
माथे पे एक चमक है, अग्नि जो प्रज्वलित है।
सर पे अलंकार है, चाँद विराजमान है।

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

मन में मेरे आप हैं, तो ख़ुशी अपने आप है,
ब्रह्माण्ड में जो जन्मे हैं, वो सब ही आपके मन में हैं।
हिमावत की पारवती, आपकी हैं संगिनी,
करुणा दृष्टि आपकी, जो आपदाएं रोकती।
जो लोक-आसमान हैं, ये तो पोशाक हैं।

जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥

शिव जी का सुख मिले, यही मेरी आस है।
जीवन के रक्षक हैं, गले में सांप हैं।
सांप की अब बात है, भूरा और लाल है,
मणि जो चमक रही, चारो और प्रकाश है!
इससे दिशाओं के बंधुओं, के चेहरे चमकते है,
जो मादक हाथी के, खाल को पहनते हैं।

सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥

भोले संपन्न करें, मुकुट जिनका चन्द्रमा,
जटा बंधी है नाग से, लाल जिसकी खाल है,
नमन जब करते हैं, सभी देव आपको,
सर से उनके फूल गिरे, चरणों में आपके।

ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥

तेज रूप मुंड-धारी, गंगा और चंद्र धारी,
हम सब को सिद्धि दो,
कामदेव भस्म करती, अग्नि की चिंगारी,
देवों के पूज्य हो।

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥

ओह शिवा मेरी रूचि, बस आप में ही है बसी,
धगद धगद सी जलती अग्नि,
जो कामदेव पे पड़ी भारी,
आप ही हैं, वो रचइता,
जो करें हिमपुत्री पर चित्रकारी।

नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥

जैसे अमावस की रात्रि, और उसपे भी बदल हो छाया,
वैसेही कंठ आपका, जैसे हो इस छाया का साया।
चन्द्रमा का भार उठाया और उठाया गंगा का,
आपने है भार उठाया, इस पूरे जगत का।

प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥
अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥

कामदेव को भस्म किया , त्रिपुरासुर का अंत किया ,
यम ने भी हार मानी , बलि का भी वध किया।
गजासुर , या अंधक हो या हो सांसारिक दुःख ,
आपके तेज के आगे कोई न पाया रुक।
नीले कमल सा कला, जिनका है कंठ,
उन शिव भगवन का में सबसे बड़ा संत।
सुगंध कदम्ब के फूलों की ,
खींच लेती हैं मधुमक्खियों को ,
जो उड़ती रहती हैं आपके चारों और भयंकर ,
में प्रार्थना करता हूँ आपकी ओह शिव शंकर।

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्‍भुजङ्गमश्वसद्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गलध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

आपका तांडव नृत्य नगाड़े की लय में जा रहा है,
जो धिमिद धिमिद कर के गा रहा है।
गले में जो नाग है, वो नाग अपनी सांस से,
फैला रहा आग है, पहले बस माथे पे थी, अब वो आकाश है।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥

मैं कब सदाशिव की पूजा कर सकूंगा?
क्या मैं कभी आपकी तरह सब को एक देख पाउँगा?
चाहें हो नागरिक या हों सम्राट,
चाहें हो कमल का फूल या फिर हो घांस,
चाहें कोमल बिस्तर हो या हो पथरीला पहाड़,
चाहें हो नाग या फूलों का हार,
चाहें हो रत्न या धुल, या मित्र या धूर्त?

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकःशिवेति मन्त्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

मैं कब खुश हो पाउँगा “शिव” मंत्र जपते हुए?
गंगा नदी के किनारे गुफा में रहते हुए?
हाथों से अपने सर के ऊपर नमस्कार करते हुए?
दुर्विचार से दूर, नेत्रों के बीच ध्यान लगाते हुए?

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवंपठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिंविमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥१४॥

इस स्तोत्र को जो पढता है, याद करता है या सुनता है,
वह पवित्र हो, महागुरु शिव की भक्ति पता है।
और ना कोई मार्ग ना उपाय,
बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर पाय।

ॐ नमः शिवाय।

Source:
https://isha.sadhguru.org/mahashivratri/hi/shiva-adiyogi/shiv-tandav-stotram-lyrics-meaning/
https://www.youtube.com/watch?v=e4vxg2stIIA&list=PLAPrVB8wngPkiWe-p_Kt5oXVM9UnC0xtX
https://greenmesg.org/stotras/shiva/shiva_tandava_stotram.php

Read my other posts here – http://www.vedantkhandelwal.in/blog

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4 Responses

  1. Hema khandelwal says:

    ZABARDAST…… YOU MUST MAKE A VIDEO 😍

  2. Megha khandelwal says:

    It shows ur dedication… It’s superb… Adwitiya…. Padh k hi Josh aa gya,to video me to mazaa aane wala hai

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