जड़ है जैसे,
ना दिख के भी,
पूरे पेड़ की नीव हो वो,
परिवार के अनुल्लिखित से,
बड़े खास से जीव हैं वो।
फटे पुराने कपड़ो में भी,
बड़े मजे से रहते हैं,
परिवार पे 100 रुपैया,
खुद पे खर्चा ना करते हैं।
पीछे सब की तारीफों के,
लम्बे पुल ये बांधते हैं,
सामने जब हम आ जाएँ,
तो आलोचक बन जाते हैं।
जड़ है जैसे,
ना दिख के भी,
पूरे पेड़ की नीव हो वो,
परिवार के अनुल्लिखित से,
बड़े खास से जीव हैं वो।
सूरज साथ ये जाते हैं,
और चाँद साथ ये आते हैं,
जीवन भर बस घिस घिस के ये,
ऊपर से मुस्काते हैं।
खुद के सपनो को तोड़ के,
परिवार के बुनते हैं,
घर पे ज़्यादा टाइम दिया तो,
ऑफिस में ये सुनते हैं।
जड़ है जैसे,
ना दिख के भी,
पूरे पेड़ की नीव हो वो,
परिवार के अनुल्लिखित से,
बड़े खास से जीव हैं वो।
कटु वाचक ये सोच समझ के,
जानबूझ बन जाते हैं,
सही राह दिखाने को ये,
खुद पत्थर बन जाते हैं।
चुप चाप से, ज़मी पे रह के,
प्रेशर में ये रहते हैं,
इसलिए तो जड़ कहता हूँ,
सब को ऊपर रखते हैं।
वेदान्त खण्डेलवाल