यह कविता एक पिता के मूक संघर्ष का प्रतिबिंब है। जिस तरह जड़ खुद अंधेरे और दबाव (Pressure) में रहकर पूरे पेड़ को खड़ा रखती है, वैसे ही पिता खुद के सपनों और जरूरतों का त्याग कर परिवार की नींव बनते हैं। उनका कठोर व्यवहार (आलोचक रूप) वास्तव में बच्चों को सही राह दिखाने का एक तरीका है। यह रचना उनके 'अनुल्लिखित' (unspoken) बलिदानों को समर्पित है।
हर शिशु, इस संसार में आने से पहले, एक कोरी स्लेट होता है—असीम संभावनाओं से भरा एक पवित्र बीज। माता-पिता के रूप में, हमारा सबसे पहला और सबसे गहरा स्वप्न यही होता है कि यह नवजीवन सिर्फ सफल न हो, बल्कि उत्तम हो; कि यह शक्ति और करुणा, ज्ञान और सरलता, साहस और नैतिक बल […]
माँ मेरी थी गणित में कच्ची,
पर प्यार का हिसाब उनसे अच्छा कोई न रख पाया।
उनकी साधारण सी जिंदगी,
मेरे लिए सबसे अनमोल कहानी बन गई।
हम चुप हैं जब बोलना चाहिए, और बँटे हुए हैं जब एक होना चाहिए।
सोचो... क्या हम कंकर हैं या पर्वत?
भारत की मिट्टी पुकार रही है —
जागो, एक बनो, वरना इतिहास दोहराएगा।
यह कविता साहित्य और विज्ञान के बीच के अंतर को दर्शाती है। कवि कहता है कि साहित्य में एक जादू है जो विज्ञान की सीमाओं को पार कर सकता है। वह कहता है कि साहित्य हमें अपनी यादों में ले जा सकता है, हमें समय में उड़ने की ताकत दे सकता है, और हमारी सोच को बदल सकता है। कवि यह भी कहता है कि साहित्य हमें अपनी रूह को छूने की ताकत देता है।
कविता का मुख्य संदेश यह है कि साहित्य विज्ञान से अलग एक अपनी दुनिया है, जो हमें नई दृष्टिकोण और अनुभव प्रदान कर सकती है।
हंस पड़ता हूँ, पूछे जब जग,माँ की याद, तो आती होगी?सच कहता हूँ, हंस देता हूँ,मन ही मन, दम भर लेता हूँ। जब हर दिन हर पल,माँ से ही है, जीवन मेरा,माँ से ही है,फिर कैसे उनको भूल मैं जाऊँ?कब न उनको याद करूँ? हर कर्म में, उनका क़र्ज़ उतारूं,हर साँस में, उनका नाम जपूँ। […]