एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट है। वर्णमाला के क्रम में एक कविता लिखने का। युगों का एक चक्र है। मतलब की कलियुग के बाद फिर से या तो त्रेतायुग या सतयुग आएगा, जब हर चीज़ फिर से बेहतर हो जाएगी। उन्ही दिनों को दिखाया है इस कविता में।
एक छोटा सा प्रयास है और लोगों तक शिव तांडव स्तोत्रम पहुंचाने का। मैंने सोचा की क्यों न इसका हिंदी अनुवाद किया जाए एक कविता के रूप में।
दुनिया को बदलने से पहले, कोशिश करो,सिर्फ एक कोशिश… अपनी सोच को बदलने की।वादा करता हूँ जल्द ही दुनिया बदलती नज़र आएगी।
जब छोटे थे तो,हम सब बड़ा बनना चाहते थे। अब जब बड़े हो गए हैं तो लगता है असली आज़ादी बचपन में ही थी। अब यही पूछता हूँ ख़ुद से की - मुझे बड़ा क्यों होना था?
हम हमेशा से कहानियां सुनते हैं भगवान की। कभी शिव जी, कभी राम जी, तो कभी कृष्ण जी की तो कभी किसी और की। और हर किसी को कोई ना कोई एक इनमे से सबसे बड़े लगते हैं।
मैंने अपने सीमित ज्ञान से एक कविता लिखी है। अगर कुछ बुरा लगे तो माफ़ करना और अच्छा लगे तो और लोगों को भी पढ़ाना।
एक छोटी सी कहानी middle class वालों की। अगर किसी को सच लगे तो भी बताना और अगर किसी को बुरा लगे... सच तो सच ही है न भाई , बुरा मान के क्या कर लोगे! ;-) :P