छोटी-छोटी उँगलियों से

छोटी-छोटी उँगलियों से,
हाथ तूने जो है पकड़ा
मेरी सारी मुश्किलों को,
जैसे मुट्ठी में हो जकड़ा।

प्यारी सी मुस्कान ने तेरी,
रात के अँधेरे में भी
चाँद-तारों को भी जैसे,
चमकीले रंगों में रंगा।

तेरी इन किलकारियों से,
बदला मौसम ज़िंदगी का
देखूँ तुझको हर घड़ी अब,
राही तेरी हाज़िरी का।

नटखटी सी आँखें तेरी,
चुलबुली सी खिलखिलाहट
जैसे मन में चल रही हो,
अगले ही पल की शरारत।

नींद में जब मुस्कुराए,
ख़्वाब क्या तू देखता है?
दूध का सागर है या फिर,
माँ का चेहरा देखता है?

मन में मेरे लहरें ऊँची,
खुशनुमा सी उठती हैं जब
भीड़ में भी ढूँढ के तू,
मेरा चेहरा देखता है।

वेदान्त खण्डेलवाल

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